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शयन आरती [Shayan Aarti]

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शयन आरती वह होता है जो भगवान को शयन देते समय किया जाता है| यह आरती बहुत संक्षिप्त होती है| इस आरती की विशेषता यही है की इसमें कभी भी शंख नहीं बजे जाती है जैसे मंगल आरती में शंख बजाकर भी भगवान को उथाय जाता है और फिर आरती की जाती है पर शयन आरती में किसी भी प्रकार की कोई वाद्य नहीं बजाय जाते हैं और खास कर शंख कभी भी नहीं क्यों के शंख जागरण ध्वनि होता है नाकि शयन की ध्वनि| बहुत से जहाज पर बस कप्पोर से ही शयन आरती की जाती है पर धूप-दीप से भी आप साहयण आरती कर सकते हैं| असल में संध्या आरती ही आरती दिन की संपन्न आरती होती है पर हम भगवान को जैसे नींद से उठाते हैं वैसे ही निद्रा लेने के लिए यानि विश्राम के लिए भी निवेदन करते हैं और यही होता है शयन आरती| शयन आरती को ही दिन के समाप्त आरती माना जाता है और फिर दूसरे दिन मंगल आरती से फिर से भगवान की दिनचर्या शुरू होती है|

आरती के प्रकार [Types of Aarti]

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आरती हम रोज सुबह शाम घर पे करते ही हैं पर क्या आप जानते हैं कि आरती करने के लिए दिन के अलग अलग भाग है और जैसे हम अपने दिनचर्या का पालन करते हैं उसी तरह भगवान के दिनचर्या के अनुसार हम आरती करते हैं| जय से सुबह मंगल आरती शाम को संध्या आरती| वैसे तो दिनचर्या के हिसाव से सुबह मंगल मुहूर्त से लेकर रात तक आरती के पांच प्रकार है पर सात प्रकार से भी भगवान की सेवा आरती की जाती है| पांच समय आरती करने को मंगल आरती, पूजा आरती, भोग आरती, संध्या आरती, शयन आरती कहाँ जाता है कई कई जगह पर मंगल आरती, धूप आरती, पूजा आरती, संध्या आरती और शयन आरती की जाती है| दिन के सात समय आरती में मंगल आरती, धूप आरती, पूजा आरती, भोग आरती, श्रृंगार आरती, संध्या आरती, शयन आरती की जाती है| इसे सुबह से लेकर सहन तक भगवान की दिन चर्या कहाँ जाता है| जैसे मंगल आरती के साथ सुबह निंग से जागना, स्नान करके वस्त्र पहनकर सुगन्धित धूप से धूप आरती, दिन के पूजा के समाप्त के साथ पूजा आरती, मध्यान्ह भोग के साथ भोग आरती, दोपहर के बाद संध्या के लिए श्रृंगार करते हुए श्रृंगार आरती, संध्या के समय धूप अर्चन के साथ संध्या आरती और रात को दिनच...

आरती की परिभाषा और तात्पर्य [ Aarti definition of significance ]

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अगर हम आरती की बात करे तो सबसे पहले यह बताना जरुरी है की आरती हमारे पांच तत्वों की प्रतीक हैं और साथ ही यह प्रकृति से जुड़ा हुआ एक आचार है| पांच तत्वों से ही हमारी विश्व और हम बने हुए हैं और इसे ही हम आरती की माध्यम से हमारे आराध्य को निवेदन करते हैं प्रेम भाव से| यह पांच तत्वों हैं भूमि (पृथ्वी), अग्नि (आग), गगन (आकाश), वायु (हवा), नीर (जल)| धूप को पृथ्वी तत्वों माना जाता है तो पंचप्रदीप को अग्नि, जलपूर्ण शंख को जल तत्वों मन है ही तो वस्त्र को आकाश और चामर या आम पीपल से पत्तों से कीजानेवाले हवा को वायु तत्वों| इसमें भूमि, अग्नि और जल तत्वों को मूल तत्वों माना गया है इसलिए धूप-दीप आरती ज्यादा प्रचलित है साथ ही जल का प्रयोग आरती के बाद की जाती है अग्नि को शांत करने के लिए और फिर सब आरती अपने सर पे ग्रहण करत्ते हैं| धूप से आरती शुरू की जाती है क्यों के धूप की सुगंध हमारे नकारात्मक ऊर्जा को ख़तम करके करके हममें सकारात्मकता लाती है और पुरे बातावरण को अध्यात्ममय बना देती है| धूप में हमेशा धुनाची धूप ही इस्तेमाल होती है आरती के लिए अगरबत्ती नहीं| जो ऊर्जा प्राकृतिक धूप हमें देती है वह अगरब...